भर्ती नहीं, सिर्फ छलावा! जब उत्तराखंड के धांधली तंत्र ने होनहार युवाओं को पलायन के लिए किया मजबूर!
*उत्तराखंड भर्ती परीक्षाओं का सच: अतीत के दागी पन्ने और युवाओं का टूटता भरोसा*
उत्तराखंड में सरकारी नौकरियां हमेशा से राज्य के युवाओं के लिए सम्मान और आजीविका का सबसे बड़ा साधन रही हैं।
लेकिन, बीते दो दशकों का इतिहास देखें तो यह क्षेत्र राजनीति, अनियमितताओं और घोटालों के साए में घिरा नजर आता है। राजनीतिक दलों के दावों और हकीकत के बीच पिसते युवाओं के लिए एक दौर वह भी था जब ‘भर्ती’ शब्द के मायने सिर्फ सिफारिश और भ्रष्टाचार बनकर रह गए थे।
*नारायण दत्त तिवारी सरकार (2002-2007): जब CBI तक पहुंची आंच*
राज्य गठन के शुरुआती सालों में एन.डी. तिवारी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौरान भर्तियों पर गंभीर सवाल उठे
*दारोगा और पटवारी भर्ती घोटाला* : इस कार्यकाल के दौरान हुई दारोगा और पटवारी भर्तियों में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप लगे।
*CBI जांच और कार्रवाई* : मामला इतना गंभीर हो गया कि इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपनी पड़ी।
*एक ही परिवार को लाभ:* जांच में सामने आया कि कथित तौर पर पैसे के लेनदेन के दम पर एक ही परिवार के कई सदस्यों का चयन कर लिया गया था। नतीजतन, युवाओं के सपनों पर पानी फेरते हुए परीक्षाओं को रद्द करना पड़ा।
*हरीश रावत सरकार (2014-2017):* आयोगों के भीतर तक पहुंचा भ्रष्टाचार
साल 2014 से 2017 के बीच हरीश रावत के कार्यकाल के दौरान भी भर्ती प्रक्रियाएं विवादों के घेरे में रहीं। उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) से लेकर अन्य विभागों में अनियमितताओं की बाढ़ आ गई
*UKSSSC VPDO भर्ती घोटाला:* ग्राम पंचायत विकास अधिकारी (VPDO) भर्ती में भारी गड़बड़ी उजागर हुई। सख्त जांच के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले अधिकारियों पर गाज गिरी। इसके अलावा आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष, सचिव और परीक्षा नियंत्रक समेत कई आला अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया।
*सिडकुल भर्ती विवाद:* औद्योगिक विकास निगम (सिडकुल) में हुई भर्तियों में प्रभावशाली नेताओं और अफसरों के रिश्तेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोप लगे। मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष जांच दल (SIT) का गठन करना पड़ा।
*आयुर्वेद विश्वविद्यालय व UBTER:* आयुर्वेद विश्वविद्यालय की नियुक्तियों में हेराफेरी और उत्तराखंड प्राविधिक शिक्षा परिषद (UBTER) की परीक्षाओं में भारी अनियमितताओं ने व्यवस्था की साख को पूरी तरह मटियामेट कर दिया। युवाओं का पलायन और टूटती उम्मीदेंइन तमाम दौरों में जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ, वह था देवभूमि के युवाओं का विश्वास। सालों तक कड़े परिश्रम और आर्थिक तंगी झेलकर तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के हाथ सिर्फ निराशा लगी। एजेंसियां जांच करती रहीं, अदालतें तारीखें देती रहीं और परीक्षाएं रद्द होती रहीं। इसी हताशा के कारण राज्य का हुनरमंद युवा रोजगार की तलाश में उत्तराखंड से पलायन करने पर मजबूर हो गया। आज भी राज्य में पारदर्शी और निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया की बहाली युवाओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई है।

