दिशा बैठक में सांसद कलेक्ट्रेट में, विधायक PWD गेस्ट हाउस में; क्या उत्तराखंड भाजपा में ‘ऑल इज नॉट वेल’?

दिशा बैठक से विधायकों की दूरी: क्या उत्तराखंड भाजपा में ‘ऑल इज नॉट वेल’?

 

उत्तराखंड की सियासत में इन दिनों ‘दिशा’ (जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति) की बैठकें विकास कार्यों से ज्यादा राजनीतिक गुटबाजी को लेकर सुर्खियों में हैं। चमोली में गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी की अध्यक्षता में हुई हालिया बैठक ने विपक्षी दल कांग्रेस को बैठे-बिठाए सरकार को घेरने का एक बड़ा मौका दे दिया है।अधिकारियों की मौजूदगी में जब सांसद विकास योजनाओं की समीक्षा कर रहे थे, तब स्थानीय विधायकों की अनुपस्थिति ने राज्य के सियासी गलियारों में कई तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

कलेक्ट्रेट में सांसद, निरीक्षण भवन में विधायक मामला तब गरमाया जब कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने आरोप लगाया कि जिस वक्त सांसद अनिल बलूनी कलेक्ट्रेट सभागार में अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे थे, ठीक उसी समय जिले के दोनों भाजपा विधायक और नगर पालिका अध्यक्ष थोड़ी ही दूर PWD के निरीक्षण भवन में मौजूद थे।

 

चर्चा है कि अधिकारियों के माध्यम से संदेश भेजने के बाद भी विधायक बैठक में नहीं आए। आखिरकार, सांसद बलूनी को खुद प्रोटोकॉल से इतर जाकर विधायकों से मिलने निरीक्षण भवन पहुंचना पड़ा।

 

कांग्रेस का हमला: “जनता भुगत रही है आपसी लड़ाई का खामियाजा”कांग्रेस ने इस घटना को भाजपा के भीतर चल रहे ‘सत्ता संघर्ष’ का खुला प्रदर्शन करार दिया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह कोई सामान्य बात नहीं है। जब सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधियों में ही आपसी तालमेल नहीं होगा, तो अधिकारी बेलगाम होंगे और राज्य के विकास कार्य ठप पड़ जाएंगे।

विपक्ष अब इसे जनता के बीच एक बड़े मुद्दे के रूप में ले जाने की तैयारी में है।क्या वाकई गुटबाजी है या सिर्फ प्रोटोकॉल की कड़वाहट?

 

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो उत्तराखंड में सांसदों और स्थानीय विधायकों के बीच ‘वर्चस्व’ की लड़ाई नई नहीं है। अक्सर दिशा की बैठकों में विकास कार्यों के श्रेय (Credit) को लेकर स्थानीय स्तर पर खींचतान देखने को मिलती है। हालांकि, भाजपा संगठन हमेशा की तरह इसे ‘अंदरूनी तालमेल’ और ‘निजी व्यस्तता’ बताकर डैमेज कंट्रोल करने में जुटा है

 

।लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या मिशन 2027 (अगले विधानसभा चुनाव) से पहले भाजपा के भीतर की यह ‘अंदरूनी खींचतान’ सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाएगी? इसका जवाब तो वक्त ही देगा, लेकिन फिलहाल चमोली की इस घटना ने उत्तराखंड की राजनीति का पारा जरूर चढ़ा दिया है।

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